जब क्राइम कहानियां सिर्फ रहस्य सुलझाने तक सीमित न रहकर इंसान के मन में झांकने लगती हैं, तब उनका असर अलग होता है। दलदल भी ऐसी ही एक वेब सीरीज है। यह समझने की कोशिश करती है कि अपराध कैसे और किन हालात में पैदा होता है। यह सीरीज डराने से ज्यादा बेचैन करती है और देखने वाले के मन में कई सवाल छोड़ जाती है। सीरीज की कहानी 7 एपिसोड की इस वेब सीरीज की कहानी मुंबई की एसीपी रीता फरेरा के इर्द-गिर्द घूमती है। वह एक सीरियल किलर से जुड़े केस की जांच कर रही हैं, लेकिन यह जांच सिर्फ क्राइम सीन तक सीमित नहीं रहती। यह उसे उसके अपने अतीत, पुराने जख्मों और अंदर के डर से भी आमने-सामने खड़ा कर देती है। बचपन का दर्द, ऑफिस में खुद को बार-बार साबित करने का दबाव और खुद पर भरोसे की कमी कहानी की रीढ़ हैं। आइडिया दमदार है, लेकिन कुछ जगह कहानी की पकड़ ढीली पड़ती है। कई सीन ऐसे हैं, जहां तर्क पूरी तरह काम नहीं करता। सीरीज में एक्टिंग भूमि पेडनेकर ने एसीपी रीता फरेरा के किरदार को पूरी गंभीरता और संतुलन के साथ निभाया है। उनके सख्त एक्सप्रेशन्स, कम डायलॉग्स और अंदर की बेचैनी को दबाकर रखने का तरीका इस किरदार पर पूरी तरह फिट बैठता है। कई सीन में उनका अभिनय असर छोड़ता है। समारा तिजोरी अपने किरदार से कहानी में गहराई जोड़ती हैं। उनके अभिनय में दर्द और कड़वाहट साफ नजर आती है, जो सीरीज को भावनात्मक मजबूती देती है। आदित्य रावल ने भी अपने किरदार को ईमानदारी से निभाया है। सहायक भूमिकाओं में गीता शर्मा का काम कहानी को बैंलेंस देता है।
सीरीज में निर्देशन और तकनीकी पक्ष डायरेक्टर अमृत राज गुप्ता ने कहानी को शोरगुल से दूर, धीमी और गंभीर रफ्तार में आगे बढ़ाया है। उन्होंने अपराध दिखाने के बजाय उसके असर और किरदारों की मानसिक हालत पर फोकस रखा है। मुंबई को अंधेरी, भारी और दबाव भरी जगह के रूप में दिखाया गया है। सीमित रोशनी और रंग सीरीज के मूड को मजबूत बनाते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक तनाव बढ़ाता है और सीन का ट्रांजिशन सहज रहता है।
सीरीज को लेकर फाइनल वर्डिक्ट दलदल एक महत्वाकांक्षी सीरीज है, जो अपराध को सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि अंदर की टूटन के रूप में देखने की कोशिश करती है। भूमि पेडनेकर का अभिनय मजबूत है, वहीं समारा तिजोरी की मौजूदगी सबसे ज्यादा असर छोड़ती है। कुछ कमियों के बावजूद यह सीरीज गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाला अनुभव देती है।बॉलीवुड | दैनिक भास्कर
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