अमित साध इंडस्ट्री में जाना-माना नाम हैं। एक्टर अपने इंटेंस और एक्शन रोल के लिए जाने जाते हैं। अमित आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने कई जतन किए हैं। बहुत सारी चुनौतियों को झेला है। एक्टर का मानना है कि इंडस्ट्री हो या समाज इंसानियत पहले होनी चाहिए। उनकी कोशिश है कि वो अपने हिस्से की इंसानियत बराबर से निभा पाए। सवाल- अमित आप सुशांत सिंह राजपूत के साथ अच्छा बॉन्ड शेयर करते थे। क्या आउटसाइडर एक्टर को जनता सपोर्ट नहीं करती है? जवाब- मैं इस बारे में बहुत सोचता हूं। जनता ने ऑलरेडी सबको बहुत कुछ दे रखा है। तो हर चीज जनता पर नहीं डाल सकते। अगर आपके घर में आग लगी हो तो आग बुझाने की ड्यूटी सबसे पहले घरवालों की होती है। न कि पड़ोसी की। वैसे ही अगर कोई एक्टर परेशान है, अकेला है तो पहला रोल इंडस्ट्री का होना चाहिए। इंडस्ट्री एक फैमिली है। अगर अपने ही अपने काम नहीं आए तो हम कौन होते हैं ऑडियंस को दोष देने वाले। मुझे लगता है कि हमें एक-दूसरे का ज्यादा ख्याल रखने की जरूरत है। एक-दूसरे के प्रति इतना गुस्सा, रंजिश या उसे इंसान को रिजेक्ट करना देना नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि इंडस्ट्री में अच्छे लोग नहीं है। लेकिन फिल्म की दुनिया मुश्किल लाइन है। लोग अपना घर छोड़कर आते हैं। ऐसे में इंडस्ट्री के लोगों को ही एक-दूसरे का ख्याल रखना चाहिए। सवाल- सुशांत ने या आपने बहुत अच्छी फिल्म बनाई है लेकिन ऑडियंस नहीं देखती। तो क्या जनता दोषी नहीं है? जवाब- ऐसे में मेरा मानना है कि अगर कोई फिल्म नहीं चली तो इसका दोष हम ऑडियंस पर नहीं डाल सकते। ऑडियंस बहुत बड़ा फैक्टर है लेकिन कई बार गणित सही नहीं बैठता है। पिक्चर अच्छी है या गंदी ये तय करने वाले भी हम कोई नहीं होते हैं। मान लीजिए, कोई फिल्म बनी, उसका एक वक्त था, उस फिल्म की किस्मत थी, उसमें वो फील था। दुनिया ने देखी और वो चल गई। अगली नहीं चली तो आगे बढ़ना चाहिए। कुछ और ट्राई करना चाहिए। सवाल- आपको नहीं लगता है कि ऑडियंस स्टार किड्स के बारे में जानने के लिए उत्सुक होती है? पैपराजी भी उन्हें ही फोकस करते हैं? जवाब- बिल्कुल नहीं। कोई ऑडियंस स्टार किड को जानने में उत्सुक नहीं होती। उनकी मार्केटिंग टीम आपको यकीन दिलाती है। जनता बहुत स्मार्ट है। जनता ये तय करती है कि उन्हें कौन सी फिल्म सिनेमा हॉल में देखनी है, कौन सी ओटीटी में और कौन सी पिक्चर नहीं देखनी है। जनता कंज्यूमर है और कंज्यूमर भगवान होता है। ऑडियंस नहीं होती तो इंडस्ट्री नहीं होती। ऑडियंस नहीं होती तो मेरे जैसा इंसान एक्टर नहीं बनता। मैं तो ऑडियंस से शिकायत ही नहीं कर सकता। उन्होंने तो मुझे सड़क से उठाकर यहां बिठा दिया है। सवाल- नेपोटिज्म पर आपकी क्या राय है? जवाब- मुझे तो लगता है कि हम सब नेपोटिज्म हैं। मेरी नजर में नेपोटिज्म कोई चीज आपको अपने मां-बाप से, कुदरत से, अपने आस-पास के माहौल से मिलना है। कुछ चीजों में आप आगे होते हैं। कुछ चीजों में कोई दूसरा बेहतर होता है। अगर मुझे कोई बोले 20 फीट से छलांग लगाने, मैं दो मिनट मैं कर दूंगा। अगर मुझे गन दोगे तो मैं सोल्जर बन जाऊंगा क्योंकि मैं हमेशा एक सोल्जर की तरह ट्रेन्ड हुआ हूं। ये मेरी नेपोटिज्म है। मार्केटिंग ने इस टर्म को गढ़ दिया है। सबको अपने हिस्से की खुशियां और स्ट्रगल मिलती है। चाहे आप सचिन तेंदुलकर के बेटे क्यों ना हो? सवाल- इस समय आपका एम्बिशन क्या है? ड्रीम रोल क्या है? जवाब- मेरे अंदर एम्बिशन नहीं काम को लेकर भूख है। ड्रीम रोल की बात करूं तो मुझे जो भी रोल मिलता है, उसमें अपना समर्पण देता हूं। उसे ही अपना ड्रीम रोल बना देता हूं। हालांकि, मैं फिल्मों में लॉयर की भूमिका निभाना चाहता हूं। मैं सुपरहीरो वाली फिल्म करना चाहता हूं। मैं कॉमेडी फिल्में करना चाहता हूं। ऑडियंस को एंटरटेनमेंट के साथ खुशी और रोमांच देना चाहता हूं। सवाल- फैंस का कोई मैसेज या तारीफ जो आपके दिल के करीब है और आप बताना चाहते हो? जवाब- मेरे पास दो ऐसे किस्से हैं। ‘काई पो चे’ के वक्त मेरी एक फैंस मुझे मैसेज करके लड़ती थी कि आप इंटरव्यू में बोलते क्यों नहीं हैं? मैं भी उससे लड़ता और बताता था कि दूसरे एक्टर मुझे बोलने ही नहीं देते। तो वो कहती कि जब आपसे सवाल करते हैं, तब तो जवाब देना चाहिए। मैंने उससे बोला कि शायद मुझे बात करने नहीं आती, मैं कोशिश करूंगा। फिल्म ‘सुल्तान’ और ‘ब्रीद‘ के बाद मैं थोड़ा बोलने लगा। इंटरव्यू में अपनी सोच बताने लगा। फिर उसका मैसेज आया कि अब मैं असली शेर को देख रही हूं। मेरी दूसरी फैन अंजलि जो अब इसे दुनिया में नहीं हैं। लेकिन वो मेरे लिए बहुत खास थीं। उनसे जब मैसेज में बात होती थी तो कुछ मैसेज मां का रूप होता, कुछ में फैन का और कुछ में बहन होती थीं। मैं अंजलि को मिस करता हूं। सवाल- अमित अपने आने वाली फिल्मों के बारे में बताइए? जवाब- ‘पुणे हाइवे’ करके मेरी एक फिल्म आ रही है। ये राहुल दा कुन्हा की प्ले पर आधारित मर्डर मिस्ट्री है। मेरे लिए ये फिल्म ‘काई पो चे’ है। इसमें भी तीन दोस्त हैं। इस पूरी फिल्म की वाइब भी ‘काई पो छे’ वाली ही है। तीन दोस्तों की कहानी है। फिल्म में ड्राई ह्यूमर है। दोस्ती और दुविधा साथ-साथ चलती है। जल्द ही इस फिल्म का प्रमोशन शुरू होगा। मेरी एक और फिल्म आ रही है ‘प्रताप’। इसमें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की कहानी है। मैं अपनी दोनों फिल्मों को लेकर बहुत उत्साहित हूं। साल 2018 में स्क्रीन पर मेरी फिल्म गोल्ड आई थी। उसके बाद अब जाकर ये दो फिल्म आ रही हैं। मेरे लिए बहुत इमोशनल पल है। उम्मीद करता हूं कि मेरी दोनों ही फिल्में चले। ऑडियंस ने अब तक जैसे प्यार दिया है, वैसा ही प्यार इन फिल्मों को मिले। सवाल- आखिर में आपके लिए सफलता क्या है? जवाब- जीवन में जो चल रहा है, वो चलते रहे। जिंदगी में जो होगा देख लेंगे। सिर झुकाना है, नजरें नहीं। मेरे लिए सफलता के मायने यही हैं।बॉलीवुड | दैनिक भास्कर
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