फिल्मों के टाइटल महज सिर्फ नाम नहीं होते, बल्कि इसके पीछे एक पूरी स्ट्रैटजी होती है। कुछ फिल्मों के टाइटल ऐसे होते हैं, जिन्हें सुनते ही फिल्म को देखने की उत्सुकता बढ़ जाती है। कभी फिल्मों के टाइटल को लेकर इतनी कंट्रोवर्सी हो जाती है कि उसे बदलना पड़ता है। किसी भी फिल्म का टाइटल कैसे डिसाइड होता है, उसके रजिस्ट्रेशन की क्या प्रक्रिया होती है, आज रील टु रियल के इस एपिसोड में समझेंगे। इस पूरे प्रोसेस को समझने के लिए हमने इम्पा के प्रेसिडेंट अभय सिन्हा और विफपा के प्रेसिडेंट संग्राम शिर्के से बात की। प्रोड्यूसर एसोसिएशन में 250 रु. से लेकर 500 रु. में टाइटल रजिस्टर्ड होता है जब कोई प्रोड्यूसर फिल्म बनाने की योजना बनाता है, तो उसे सबसे पहले अपनी प्रोडक्शन कंपनी को रजिस्टर्ड कराना पड़ता है। जब फिल्म की कहानी तैयार हो जाती है, तब टाइटल फाइनल करने की प्रक्रिया शुरू होती है। टाइटल रजिस्ट्रेशन के लिए 500 रुपए (जीएसटी सहित) का शुल्क लिया जाता है। कुछ एसोसिएशन 250 रुपए में फिल्म का टाइटल रजिस्टर्ड करते हैं। चार एसोसिएशन मिलकर तय करते हैं फिल्म का टाइटल फिल्म प्रोड्यूसर्स की चार एसोसिएशन है। जिसमें इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन, वेस्टर्न इंडिया फिल्म प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन, प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और इंडियन फिल्म्स एंड प्रोड्यूसर्स काउंसिल है। प्रोड्यूसर इनमें से जिस एसोसिएशन का मेंबर होता है, उसमें टाइटल रजिस्टर्ड करवाता है। उसके बाद एसोसिएशन के पदाधिकारी बाकी तीन एसोसिएशन में टाइटल भेजकर यह कन्फर्म करते हैं कि वह टाइटल वहां रजिस्टर्ड तो नहीं है। अगर वहां से कोई ऑब्जेक्शन आता है तो वह टाइटल प्रोड्यूसर को नहीं मिलता है। फिर उन्हें टाइटल में बदलाव करने का सुझाव दिया जाता है। एक महीने के अंदर टाइटल का कन्फर्मेशन मिलता है आम तौर पर एक एसोसिएशन में एक महीने में एक हजार टाइटल रजिस्ट्रेशन के लिए आते हैं। उसके बाद सभी एसोसिएशन के कमेटी मेंबर मिलकर टाइटल डिसाइड करते हैं। 22 लोग कमेटी में शामिल होते हैं। कमेटी की हर महीने में दो बार मीटिंग होती है। मीटिंग में इस बात का ध्यान दिया जाता है कि टाइटल में अश्लीलता नहीं होनी चाहिए। या फिर कोई विवादित टाइटल ना हो, जिसकी वजह से आगे चलकर कोई प्रॉब्लम हो। एक प्रोड्यूसर हर भाषा में 15 टाइटल रजिस्टर्ड करवा सकता है। टाइटल रजिस्ट्रेशन के लिए फास्ट-ट्रैक सुविधा उपलब्ध होती है अगर किसी प्रोड्यूसर को टाइटल जल्दी चाहिए या फिल्म रिलीज के करीब है, लेकिन फिल्म का टाइटल रजिस्टर नहीं हुआ है, तो 3000 रुपए के विशेष शुल्क पर फास्ट-ट्रैक सुविधा पर टाइटल रजिस्टर्ड करवा सकता है। इस प्रक्रिया के तहत एक हफ्ते के भीतर टाइटल पर निर्णय लिया जाता है। ऑनलाइन रिक्वेस्ट की सुविधा अब टाइटल रजिस्ट्रेशन के लिए ऑनलाइन आवेदन और भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध है। आवेदन करने के बाद आवेदक को ईमेल से जानकारी दी जाती है कि उसे फिल्म का टाइटल मिलेगा या नहीं। यदि किसी प्रोड्यूसर का टाइटल रिजेक्ट हो जाता है, तो वह दोबारा आवेदन कर सकता है। टाइटल अलॉटमेंट के नियम यदि कोई प्रोड्यूसर टाइटल रजिस्टर कराने के बाद दो साल तक फिल्म नहीं बनाता है, तो कोई अन्य प्रोड्यूसर उस टाइटल के लिए आवेदन कर सकता है। इसके लिए पहले टाइटल होल्डर से पूछा जाता है कि क्या वे टाइटल का इस्तेमाल करेंगे। यदि वे पीछे हटते हैं, तो टाइटल नए आवेदक को दिया जा सकता है। टाइटल काे अनऑफिशियल रूप से बेचना नियमों के खिलाफ है, लेकिन ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। यदि कोई प्रोड्यूसर बिना टाइटल रजिस्ट्रेशन के फिल्म का मुहूर्त करता है, तो उसे नोटिस भेजकर पेनल्टी लगाई जाती है। किन- किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है? वेस्टर्न इंडिया फिल्म प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (विफपा) के प्रेसिडेंट संग्राम शिर्के ने बताया- यह ध्यान देना पड़ता है कि फिल्म का टाइटल टीवी या वेब सीरीज को न दें। कभी-कभी मिलते-जुलते टाइटल से तीन-चार फिल्में बनती हैं। जैसे भगत सिंह के जीवन पर एक साथ तीन फिल्में बनी थीं, उस समय टाइटल को लेकर बहुत झगड़े हुए थे उसे हमें संभालना पड़ा था। हमारे यहां 35 हजार और इम्पा में 25 हजार मेंबर हैं। इसलिए हमारे पास ज्यादा टाइटल आते हैं। बाकी एसोसिएशन में इतने ज्यादा मेंबर नहीं हैं, इसलिए उनके पास ज्यादा टाइटल नहीं आते हैं। टाइटल रजिस्टर्ड होने के बाद अगर दो- तीन साल तक फिल्म नहीं बनती है तो प्रोड्यूसर को टाइटल सरेंडर करना पड़ता है। मदर इंडिया जैसी क्लासिक फिल्मों का टाइटल किसी को नहीं देते हैं। सेंसर सर्टिफिकेट मिलने के बाद प्रोड्यूसर के पास 5 साल तक टाइटल फिल्म के टाइटल के लिए संजय दत्त ने खुद फोन किया इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (इम्पा) के प्रेसिडेंट अभय सिन्हा ने संजय दत्त की फिल्म ‘द भूतनी’ से जुड़ा एक किस्सा शेयर किया। उन्होंने कहा- ‘द भूतनी’ के प्रोड्यूसर दीपक मुकुट का ‘भूतनी’ टाइटल के लिए मेरे पास फोन आया कि यह टाइटल उन्हें चाहिए। यह टाइटल किसी और के पास था। इसलिए मैंने मना कर दिया। उसके बाद संजय दत्त ने खुद फोन किया और उन्होंने कहा कि अरे भाई, आपके हाथ में है टाइटल दे दो, लेकिन जब टाइटल पहले से ही किसी और के नाम से रजिस्टर्ड है तो उसे मैं कैसे दे सकता था। हालांकि जिस प्रोड्यूसर के पास फिल्म का टाइटल था, उनसे रिक्वेस्ट की तो उन्होंने टाइटल दे दिया। उसके बाद उन्होंने फिल्म का टाइटल ‘द भूतनी’ रखा। दो प्रोड्यूसर आपसी सहमति से टाइटल का आदान-प्रदान कर सकते हैं, लेकिन इसमें एसोसिएशन किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करता है।’ ‘आशिकी’ टाइटल विवाद कोर्ट तक पहुंचा मुकेश भट्ट की विशेष फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और टी-सीरीज की सुपर कैसेट्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने ‘आशिकी 3’ बनाने की योजना बनाई, लेकिन इस पर विवाद तब हुआ जब टी-सीरीज ने ‘तू ही आशिकी’ जैसे टाइटल से फिल्म की घोषणा की। इसे लेकर टी सीरीज के खिलाफ मुकेश भट्ट ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। मुकेश भट्ट की तरफ से आरोप लगाया गया था कि टी-सीरीज उनकी इजाजत के बिना ‘आशिकी’ शब्द का इस्तेमाल कर रहा है। इस मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए मुकेश भट्ट के हक में फैसला सुनाया था। टी-सीरीज और उसके सहयोगियों को ‘आशिकी’ शब्द के साथ किसी भी टाइटल का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी गई थी। बता दें कि ‘आशिकी’ (1990) और ‘आशिकी 2’ (2013) विशेष फिल्म्स और टी-सीरीज की साझेदारी और संयुक्त क्रेडिट्स के साथ बनाई गई थी। ‘पद्मावती’ फिल्म के टाइटल को लेकर विवाद ‘पद्मावती’ फिल्म के टाइटल को लेकर भी विवाद हुआ था, जिसे बाद में बदलकर ‘पद्मावत’ कर दिया गया। यह विवाद फिल्म की ऐतिहासिक सटीकता और रानी पद्मावती के चित्रण को लेकर था, जिसमें कुछ संगठनों ने फिल्म में इतिहास को विकृत करने और रानी पद्मावती की छवि को धूमिल करने का आरोप लगाया था। श्रीदेवी फिल्म का टाइटल रखने पर राम गोपाल वर्मा पर भड़की थीं एक्ट्रेस राम गोपाल वर्मा ने अपनी फिल्म का नाम सावित्री से बदलकर श्रीदेवी कर दिया था। इस वजह से श्रीदेवी और उनके पति बोनी कपूर नाराज हो गए। श्रीदेवी ने रामू को कानूनी नोटिस भेजकर नाम बदलने, बिना शर्त माफी मांगने और फिल्म में उनके नाम या छवि के किसी भी तरह के इस्तेमाल को रोकने की मांग की थी। रामू ने फेसबुक पर सफाई देते हुए कहा कि उनकी फिल्म एक किशोर लड़के की 25 वर्षीय महिला के प्रति दीवानगी पर आधारित है और इसका श्रीदेवी से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि यह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई थी। वीएचपी-बजरंग दल की आपत्ति, कोर्ट ने किया खारिज जब सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ का पोस्टर 2015 में रिलीज हुआ, तो विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने नाम बदलने की मांग की। मामला कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और फिल्म अपने ओरिजिनल नाम से रिलीज हुई। धार्मिक टाइटल पर SGPC की आपत्ति, लेकिन नाम नहीं बदला सनी देओल की फिल्म ‘सिंह साब द ग्रेट’ पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC) ने आपत्ति जताई थी। SGPC का कहना था कि सिंह साब एक सम्मानजनक उपाधि है, जिसे पांच तख्तों के जत्थेदारों और स्वर्ण मंदिर के ग्रंथियों को दिया जाता है, इसलिए इसे किसी फिल्म के टाइटल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि फिल्म का नाम नहीं बदला गया और विवाद के बावजूद फिल्म इसी नाम से रिलीज हुई। ‘रैंबो’ नाम पर विवाद प्रभुदेवा की फिल्म का नाम रैंबो राजकुमार था, लेकिन रैंबो फ्रेंचाइजी के निर्माताओं ने इस पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि रैंबो नाम कॉपीराइट है और इसे किसी अन्य फिल्म के टाइटल में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। नतीजतन, फिल्म का नाम बदलकर ‘आर… राजकुमार’ कर दिया गया। रजनीकांत की याचिका पर बदला फिल्म का नाम डायरेक्टर फैसल सैफ को ‘मैं हूं रजनीकांत’ का नाम बदलकर ‘मैं हूं रजनी’ करना पड़ा, क्योंकि रजनीकांत ने इस पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि फिल्म का टाइटल उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। हिंदू संगठनों की आपत्ति के बाद टाइटल में बदलाव अक्षय कुमार की एक हॉरर-कॉमेडी फिल्म का नाम पहले लक्ष्मी बॉम्ब था, लेकिन कुछ हिंदू संगठनों ने इसे माता लक्ष्मी के नाम से जोड़कर आपत्ति जताई, जिसके बाद फिल्म का नाम बदलकर लक्ष्मी कर दिया गया। कोर्ट केस के बाद रिलीज से 48 घंटे पहले बदला नाम संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला: राम-लीला’ बॉक्स ऑफिस पर हिट रही, लेकिन इसके टाइटल को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। कुछ संगठनों का मानना था कि राम-लीला नाम हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है, क्योंकि फिल्म में हिंसा और बोल्ड सीन थे। मामला कोर्ट तक पहुंचा, जिसके बाद रिलीज से ठीक 48 घंटे पहले फिल्म का नाम बदल दिया गया। ऐतिहासिक सम्मान बनाए रखने के लिए बदला गया टाइटल ऐतिहासिक सम्मान बनाए रखने के लिए ‘पृथ्वीराज’ फिल्म का नाम बदलकर ‘सम्राट पृथ्वीराज’ कर दिया गया। यह बदलाव इसलिए किया गया ताकि महान राजा को पूरे सम्मान के साथ प्रस्तुत किया जा सके। नाई समुदाय की नाराजगी के बाद हटा ‘बार्बर’ शाहरुख खान की फिल्म ‘बिल्लू बार्बर’ में नाई समुदाय ने बार्बर शब्द पर आपत्ति जताई। हजारों हेयर ड्रेसर्स ने विरोध किया, जिसके बाद फिल्म का नाम बदलकर सिर्फ ‘बिल्लू’ कर दिया गया। शाहरुख खान ने कहा कि वह किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे। ______________________________________________ रील टु रियल की ये स्टोरी भी पढ़ें.. फिल्म प्रोजेक्शन के पुराने दिनों की अनसुनी कहानियां:जब शोले सिर्फ चार प्रिंट से रिलीज हुई थी, बाइक पर प्रिंट लेकर दौड़ते थे थिएटर से थिएटर सिनेमाघरों के प्रोजेक्शन रूम में पहले फिल्म की भारी-भरकम रील प्रोजेक्टर पर लगाई जाती थीं, जिन्हें हर 15-20 मिनट में बदलना पड़ता था। जरा सी चूक होती, तो फिल्म बीच में रुक जाती या रील जल जाती। कभी सिनेमाघरों में रील समय पर नहीं पहुंचती, तो कभी चोरी हो जाती या खराब निकलती, जिससे ऑडियंस को काफी परेशानी होती थी। पूरी खबर पढ़ें…..बॉलीवुड | दैनिक भास्कर
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