December 28, 2024
क्या हुआ था उस दिन, कैसे सोनिया गांधी ने अचानक मनमोहन सिंह को Pm बनाया, जानिए पूरा किस्सा

क्या हुआ था उस दिन, कैसे सोनिया गांधी ने अचानक मनमोहन सिंह को PM बनाया, जानिए पूरा किस्सा​

Manmohan Singh Death: मनमोहन सिंह खुद को एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और फाइनेंस मिनिस्टर कहते थे. हालांकि, दोनों ही पदों पर उनके किए काम भारत हमेशा याद रखेगा. जानिए, कैसे बने थे वो पीएम...

Manmohan Singh Death: मनमोहन सिंह खुद को एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और फाइनेंस मिनिस्टर कहते थे. हालांकि, दोनों ही पदों पर उनके किए काम भारत हमेशा याद रखेगा. जानिए, कैसे बने थे वो पीएम…

Manmohan Singh Death: पूर्व पीएम मनमोहन सिंह का निधन बृहस्पतिवार रात हो गया. भारत की आर्थिक प्रगति का शिल्पकार अगर उन्हें कहा जाए तो गलत नहीं होगा, हालांकि, सौम्य, ईमानदार, बेहद पढ़े-लिखे मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने का किस्सा बेहद अजीब है. 2004 के लोकसभा चुनाव की मतगणना तक किसी को अंदाजा नहीं था कि अटल सरकार चुनाव हार सकती है. सभी चुनावी विश्लेषक एनडीए सरकार की वापसी का दावा कर रहे थे. मतगणना के शुरुआती रुझानों में भाजपा पिछड़ी तो लगा कि ये शुरुआती रुझान हैं. बीजेपी वापसी जरूर करेगी, लेकिन वो संभव न हो सका. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए चुनाव जीत गई. माना जा रहा था कि सोनिया गांधी ही अब प्रधानमंत्री बनेंगी. हालांकि, 1998 में सोनिया गांधी के राजनीति में आते ही विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा जैसे कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी छोड़ दी और 10 जून 1999 को नई पार्टी बना ली थी.

फिर भी चूकि नंबर यूपीए के पक्ष में थे और शरद पवार से लेकर लालू यादव तक सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने को लेकर दावे कर रहे थे, तो लग रहा था कि इस जीत के बाद अब विदेशी मूल का मुद्दा समाप्त हो चला है. बीजेपी के भी ज्यादातर नेता खामोश थे, तभी सुषमा स्वराज और उमा भारती ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को गरमा दिया और यहां तक कह दिया कि सोनिया गांधी ने पीएम पद की शपथ ली तो अपने केश कटवा लेंगी. मामला फिर गर्म हो गया.

10 जनपथ पर कांग्रेस के कार्यकर्ता सोनिया गांधी के पक्ष में नारेबाजी करने लगे. इसी घटना का जिक्र करते हुए अपनी आत्मकथा One Life Is Not Enough में पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने लिखा कि 17 मई 2004 दोपहर के लगभग दो बजे वे 10 जनपथ पहुंचे. उन्हें अंदर बुलाया गया. कमरे में सोनिया गांधी सोफे पर बैठी थीं. वो बेचैन दिख रही थीं. मनमोहन सिंह और प्रियंका गांधी भी वहां मौजूद थे. तभी राहुल गांधी वहां आए. सोनिया गांधी से सीधे राहुल ने कहा, “आपको प्रधानमंत्री नहीं बनना है. मेरे पिता की हत्या कर दी गई. दादी की हत्या कर दी गई. छह महीने में आपको भी मार देंगे.” इसके बाद वहां सन्नाटा पसर गया.

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नटवर सिंह के अनुसार राहुल गांधी ने सोनिया गांधी को उनकी बात मानने के लिए 24 घंटे का वक्त दिया. इसी के साथ उनकी बात न मानने पर किसी हद तक जाने की धमकी दी. राहुल गांधी के यह कहने पर कि वे उन्हें प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से रोकने के लिए हर मुमकिन कदम उठाएंगे, सोनिया गांधी की आंखों में आंसू आ गए. मनमोहन सिंह बिल्कुल चुप थे. प्रियंका ने कहा था ” राहुल कुछ भी कर सकते हैं.” राहुल की जिद ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी ठुकराने के लिए मजबूर कर दिया था. वहीं नीरजा चौधरी ने अपनी किताब How Prime Ministers Decide में लिखा है कि इस घटनाक्रम के कुछ ही दिन बाद नटवर सिंह के अलावा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी उन्हें बताया था कि सोनिया गांधी के बच्चे नहीं चाहते कि वे प्रधानमंत्री पद स्वीकार करें, क्योंकि उनकी जिंदगी खतरे में पड़ने की आशंका से वे डरे हुए हैं. विश्वनाथ प्रताप सिंह उस समय सोनिया गांधी के पक्ष में सरकार बनाने के पक्ष में थे. नीरजा चौधरी से सोमनाथ चटर्जी ने भी विश्वनाथ प्रताप सिंह के कथन की पुष्टि करते हुए कहा था कि हमने तो उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार किया था, लेकिन उनके बच्चे नहीं चाहते थे कि वे इसे स्वीकारें. विश्वनाथ प्रताप सिंह के निकट रहे संतोष भारतीय ने भी अपनी किताब ” विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गांधी और मैं ” में इस प्रसंग का उल्लेख किया है.

‘‘द पीएम इंडिया नेवर हैड” शीर्षक वाले अध्याय में शर्मिष्ठा यह भी लिखती हैं, ‘‘प्रधानमंत्री पद की दौड़ से हटने के सोनिया गांधी के फैसले के बाद, मीडिया और राजनीतिक हलकों में तेज अटकलें थीं. इस पद के लिए प्रबल दावेदारों के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह और प्रणब के नामों पर चर्चा हो रही थी.मुझे कुछ दिनों तक बाबा (प्रणब मुखर्जी) से मिलने का मौका नहीं मिला, क्योंकि वह बहुत व्यस्त थे, लेकिन मैंने उनसे फोन पर बात की. मैंने उनसे उत्साहित होकर पूछा कि क्या वह प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. उनका दो टूक जवाब था, ‘नहीं, वह मुझे प्रधानमंत्री नहीं बनाएंगी’ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह होंगे.” हालांकि, प्रणब मुखर्जी मनमोहन सिंह से सीनियर थे.

‘ए प्रॉमिस्ड लैंड’ में ओबामा लिखते हैं कि प्रधानमंत्री पद पर मनमोहन सिंह के पहुंचने को कई बार जातीय विभाजन पर भारत की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह बात ठीक नहीं है. मनमोहन के प्रधानमंत्री बनने के पीछे असल कहानी सभी का पता है. वह पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं थे. ओबामा ने कहा कि यह पद उन्हें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिया था. कई राजनीतिक समीक्षकों का तो यह भी मानना है कि उन्होंने बुजुर्ग सिख को इसलिए चुना, क्योंकि उनका कोई राष्ट्रीय राजनीतिक आधार नहीं था और वह उनके 47 वर्षीय बेटे राहुल के लिए कोई खतरा नहीं थे. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी किताब में कांग्रेस के अंदरूनी मामलों को लेकर राय जाहिर की है. उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को इसलिए प्रधानमंत्री बनाया था, क्योंकि उन्हें मनमोहन सिंह से कोई खतरा महसूस नहीं होता था. वर्ष 2010 में भारत आए पूर्व राष्ट्रपति ने अपनी किताब में पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के आवास पर आयोजित एक रात्रिभोज का भी जिक्र किया है. पार्टी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों नेता शामिल थे. ओबामा लिखते हैं, ‘सोनिया गांधी बोलने से ज्यादा सुनने पर गौर कर रही थीं. इसके अलावा बातचीत में वह चर्चा को अपने बेटे की तरफ मोड़ देती थीं. किताब में ओबामा ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात और अनौपचारिक बातचीत का भी जिक्र किया. ओबामा ने लिखा कि भारत की अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के मुख्य शिल्पकार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे और वह इस प्रगति गाथा के सही प्रतीक हैं.

मनमोहन सिंह के पांच दशक का करियर

1954: पंजाब विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की.

1957: कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इकॉनमिक्स ट्रिपोस (तीन वर्षीय डिग्री प्रोग्राम).

1962: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डी.फिल.

1971: वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में भारत सरकार में शामिल हुए.

1972: वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त हुए.

1980-82: योजना आयोग के सदस्य रहे.

1982-1985: भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे.

1985-87: योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया.

1987-90: जिनेवा में दक्षिण आयोग के महासचिव रहे.

1990: आर्थिक मामलों पर प्रधानमंत्री के सलाहकार नियुक्त हुए.

1991: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए.

1991: असम से राज्यसभा के लिए चुने गए और 1995, 2001, 2007 और 2013 में फिर से चुने गए.

1991-96: पी वी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री रहे.

1998-2004: राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे.

2004-2014: भारत के प्रधानमंत्री रहे.

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