April 4, 2025

Explainer: वक्‍फ को लेकर क्‍यों छिड़ा है घमासान, संपत्ति से विवादों तक जानें हर बात​

वक़्फ़ क़ानून 1995 के मुताबिक वक़्फ़ का अर्थ है किसी चल-अचल संपत्ति को स्थायी तौर पर उन मक़सदों के लिए दान करना जिन्हें इस्लाम में पवित्र और धार्मिक माना जाता है.

वक़्फ़ क़ानून 1995 के मुताबिक वक़्फ़ का अर्थ है किसी चल-अचल संपत्ति को स्थायी तौर पर उन मक़सदों के लिए दान करना जिन्हें इस्लाम में पवित्र और धार्मिक माना जाता है.

वक़्फ़ क़ानून में संशोधन का मुद्दा गर्माया हुआ है. राज्‍यसभा और लोकसभा में यह विधेयक पास हो गया है. दोनों ही सदनों में इस पर गर्मागर्म बहस हुई है. इसके कई प्रावधानों को लेकर विपक्ष ने जमकर विरोध किया है और इसे मुस्लिम समुदाय की संस्थाओं में दखल बताया है. हालांकि सरकार ने अपनी ओर से सख़्ती से इन आरोपों का खंडन किया है. ख़ास बात ये है कि बीजेपी को एनडीए में शामिल अपने बड़े सहयोगियों जेडीयू और टीडीपी का समर्थन मिला. वक़्फ़ संशोधन बिल के इस पूरे मुद्दे को गहराई से सिलसिलेवार समझना ज़रूरी है.

सबसे पहले ये जान लेते हैं कि वक़्फ़ का अर्थ क्या है. वक़्फ़ क़ानून 1995 के मुताबिक वक़्फ़ का अर्थ है किसी चल-अचल संपत्ति को स्थायी तौर पर उन मक़सदों के लिए दान करना जिन्हें इस्लाम में पवित्र और धार्मिक माना जाता है.

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अब सवाल ये है कि ये मक़सद क्या हैं. इसके तहत मस्जिद और क़ब्रिस्तान का रख-रखाव, शिक्षण संस्थाओं और स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाओं का प्रबंधन करना, ग़रीबों और विकलांगों को वित्तीय मदद देना जैसे मकसद हैं.

कोई संपत्ति कब वक़्फ़ की कब?

अब सवाल है कि इन तमाम मक़सदों के लिए कोई संपत्ति कब वक़्फ़ की हो सकती है. पुराने क़ानून के मुताबिक इसके कई तरीके हैं.

  • किसी संपत्ति को मौखिक या लिखित दस्तावेज़ से वक़्फ़ में शामिल किया जा सकता है.
  • किसी ज़मीन के लंबे समय तक धार्मिक और कल्याणकारी कामों में इस्तेमाल से वो वक़्फ़ की हो सकती है.
  • किसी ज़मीन के वारिस के उपलब्ध न होने के बाद वो वक़्फ़ की हो सकती है.

वक़्फ़ को बनाने वाले को वाकिफ़ कहा जाता है, जिसका प्रबंधन प्रशासक यानी मुतवल्ली प्रबंधन करता है.

वक़्फ़ की संपत्ति इस्लाम धर्म के अनुयायियों द्वारा दान की जाती है और इस्लाम धर्म के सदस्यों द्वारा उनका प्रबंधन यानी मैनेजमेंट किया जाता है. इसके लिए हर राज्य में एक वक़्फ़ बोर्ड है, जो एक क़ानूनी संस्था है जो संपत्ति को हासिल कर सकती है, रख सकती है और उसको ट्रांसफ़र कर सकती है.. वक़्फ़ की संपत्ति को स्थायी तौर पर लीज़ पर नहीं दिया जा सकता, ना ही बेचा जा सकता है.

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देश में कितनी है वक्‍फ की संपत्ति?

अब सवाल ये है कि वक़्फ़ के पास आख़िर कितनी संपत्ति है. सितंबर 2024 तक के अनुमान के मुताबिक देश में वक़्फ़ बोर्ड 8 लाख 70 हज़ार रजिस्टर्ड अचल संपत्तियों के तहत 9.4 लाख एकड़ ज़मीन का प्रबंधन करती है. सच्चर कमेटी द्वारा 2006 के आकलन के मुताबिक इसकी अनुमानित क़ीमत क़रीब 1.2 लाख करोड़ रुपए है. ध्यान रहे ये 2006 का आकलन है.

हालांकि गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक 1913 से 2013 तक वक़्फ़ बोर्ड के पास 18 लाख एकड़ संपत्ति थी. 2013 से 2025 के बीच 21 लाख एकड़ संपत्ति और जुड़ गई और कुल संपत्ति 39 लाख एकड़ हो गई. गृह मंत्री के बयान के आधार पर कहा जा सकता है कि वक़्फ़ बोर्ड के पास देश में सबसे ज़्यादा संपत्ति है, सेना और रेलवे से भी कहीं ज़्यादा.

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के मुताबिक दुनिया में सबसे ज़्यादा वक़्फ़ संपत्ति भारत में है.

भारत में कितने वक्‍फ बोर्ड हैं?

अब अगला तथ्य ये कि देश में कितने वक़्फ़ बोर्ड हैं. देश में 30 वक़्फ़ बोर्ड हैं और जैसा हमने बताया ये बोर्ड कृषि भूमि, इमारतें, दरगाह या मज़ार, कब्रिस्तान, ईदगाह, ख़ानकाह, मदरसे, मस्जिद, स्कूल, दुकानें और कई अन्य संस्थाओं का प्रबधन करती हैं, लेकिन वक़्फ़ की इनमें से कई संपत्तियों पर लगातार विवाद रहे हैं और कई फ़ैसलों के लिए वक़्फ़ ट्राइब्यूनल के सामने लंबित हैं.

सरकार के मुताबिक वक़्फ़ ट्राब्यूनल के सामने 40,951 केस लंबित पड़े हैं. इनमें से 9,942 केस मुस्लिम समुदाय के लोगों के ही द्वारा वक़्फ़ से जुड़ी संस्थाओं के ख़िलाफ़ दायर किया गया है. वक़्फ़ संशोधन बिल का मक़सद इस लिटिगेशन को कम करना भी बताया गया है.

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वक़्फ़ क़ानून में संशोधन की जरूरत क्‍यों?

अब सवाल ये है कि सरकार आख़िर क्यों वक़्फ़ क़ानून में संशोधन करना चाहती है. इनमें से कुछ वजह हमने आपको पहले बताई. दरअसल सरकार का मक़सद है कि वक़्फ़ की संपत्तियों के रख-रखाव और प्रबंधन में जो खामियां और भ्रष्टाचार है उन्हें दूर किया जाए. पुराने क़ानूनों में जो कमियां रह गई थीं उन्हें दूर किया जाए और वक़्फ़ बोर्ड की क्षमता को बेहतर किया जाए. वक़्फ़ बोर्ड की संपत्तियों के प्रबंधन में जवाबदेही और पारदर्शिता लाई जाए. वक़्फ़ की परिभाषा को अपडेट किया जाए. वक़्फ़ की संपत्ति के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में सुधार किया जाए. वक़्फ़ के रिकॉर्ड के प्रबंधन में नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाए.

वक्‍त की संपत्ति में क्‍या-क्‍या?

  • वक़्फ़ की संपत्तियों में से 17% कब्रिस्तान हैं
  • 16% कृषि भूमि है
  • 14% मस्जिदों के पास है
  • 13% पर दुकानें हैं

किस राज्‍य में कितनी संपत्ति?

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के मुताबिक सबसे ज़्यादा 2,32,547 संपत्तियां उत्तर प्रदेश में हैं. आइये जानते हैं कि किस राज्‍य में कितनी संपत्ति है.

  • 27% उत्तरप्रदेश में हैं
  • 9% पश्चिम बंगाल में
  • 9% पंजाब में
  • 8% तमिलनाडु में
  • 7% कर्नाटक में
  • 6% केरल में
  • 5% तेलंगाना में
  • 29% संपत्तियां और अन्य राज्यों में बाकी हैं.

इनमें शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड दोनों के तहत आने वाली संपत्तियां शामिल हैं.

महाराष्‍ट्र में कई संपत्तियों पर विवाद

कई संपत्तियां ऐसी हैं, जिन पर वक्‍फ बोर्ड द्वारा समय-समय पर दावा किया जाता रहा है, लेकिन उनका विरोध भी होता रहा है. महाराष्ट्र में ही ऐसी कई संपत्तियां हैं. खुद मुस्लिम समाज से जुड़े लोग वक़्फ़ बोर्ड के ऐसे दावों पर सवाल उठाते रहे हैं, जैसे मुंबई की मीनारा मस्जिद का मामला ही लीजिए जिस पर वक़्फ़ का दावा है. क़रीब डेढ़ सौ साल पुरानी मीनारा मस्जिद ब्रिटिश दौर से ही एक ट्रस्ट के हाथ में है. मामला कोर्ट में है. आरोप लग रहे हैं कि ऐसी 50 मस्जिदों पर वक़्फ़ बोर्ड की नज़र है.

वक़्फ़ बिल पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोल्हापुर जिले के वडंगे गांव के महादेव मंदिर का ज़िक्र किया था. वक़्फ़ बोर्ड इस महादेव मंदिर की जगह पर अपना दावा कर रहा है. कुछ महीने पहले भी वडंगे के ग्रामीणों ने इसी मुद्दे पर धरना देकर विरोध जताया था.

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यूपी की भी कई संपत्तियों पर विवाद

वक़्फ़ की सबसे ज़्यादा 27% संपत्तियां उत्तरप्रदेश में हैं और इनमें से कई संपत्तियों पर विवाद हैं. उत्तर प्रदेश सरकार का तो दावा है कि राज्य में वक़्फ़ बोर्ड द्वारा अपनी बताई जा रही 78% ज़मीन वास्तव में सरकारी है. यही नहीं वक़्फ़ की संपत्तियों से होने वाली आमदनी में भी भ्रष्टाचार का आरोप है. देशभर में सवा लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा की वक़्फ़ संपत्तियां हैं. अनुमान के मुताबिक इनसे औसतन आमदनी 1250 करोड़ रुपये सालाना आनी चाहिए लेकिन आती है मात्र 150 करोड़. ऐसे में 1100 करोड़ रुपए किसकी जेब में जा रहे हैं, ये एक बड़ा सवाल है. यूपी के अल्पसंख्यक कल्याण राज्य मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी ने वक़्फ़ बिल को लेकर एनडीटीवी से कहा कि ये लड़ाई आम बनाम ख़ास की है.

बिहार में 3 हजार वक़्फ़ संपत्तियां

बिहार में भी वक़्फ़ बोर्ड के पास 3 हज़ार से ज़्यादा संपत्तियां रजिस्टर्ड हैं. इनमें शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड दोनों हैं. अकेले पटना में ही वक़्फ़ बोर्ड की 300 से ज़्यादा संपत्तियां हैं. राज्य में वक्फ़ की कुल संपत्तियों में से ढाई सौ से तीन सौ संपत्तियों पर कोर्ट में मुकदमे चल रहे हैं. शिया वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन अफ़ज़ल अब्बास के मुताबिक राज्य में शिया वक़्फ़ बोर्ड के पास 327 संपत्तियां हैं जिनमें से 117 अकेले पटना में हैं. इनमें से 137 संपत्तियों से जुड़े केस वक़्फ़ ट्राइब्यूनल के पास हैं और 37 मामले हाइकोर्ट में लंबित हैं.

दिल्ली की बात करें तो यहां भी वक़्फ़ का कई संपत्तियों पर दावा रहा है. दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड हुमायूं के किले और क़ुतुब मीनार कॉम्प्लेक्स में मुग़ल मस्जिद पर भी दावा करता रहा है और उसका दावा है कि क़रीब डेढ़ सौ ऐतिहासिक संपत्तियां ग़ैरक़ानूनी तरीके से भारतीय पुरातत्व विभाग के कब्ज़े में हैं.

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तो संसद की जमीन वक़्फ़ बोर्ड के पास होती: रिजिजू

लोकसभा में बिल को पेश करते हुए संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि 1970 से दिल्ली में चले आ रहे एक केस में कई संपत्तियों पर वक़्फ़ का दावा है. इनमें सीजीओ कॉम्प्लेक्स और संसद की इमारत तक शामिल है, जिन्हें दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड अपनी संपत्ति होने का दावा करता रहा है. किरेन रिजिजू ने दावा किया कि केस कोर्ट में होने के बावजूद 2014 में सत्ता से बाहर होने से पहले तत्कालीन यूपीए सरकार ने ऐसी 123 संपत्तियों को डिनोटिफाई कर दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के हवाले कर दिया. इनमें से अधिकतर लुटियंस ज़ोन में हैं. रिजिजू ने दावा किया कि 2018 में एनडीए सरकार ने इस फ़ैसले की समीक्षा की और इन संपत्तियों के मालिकाना अधिकार पर विचार के लिए एक पैनल बना दिया.

रिजिजू ने कहा कि अगर हमने वक़्फ़ संशोधन बिल पेश नहीं किया होता तो जिस संसद में हम बैठे हैं वो वक़्फ़ बोर्ड के पास होती.

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इन संपत्तियों पर भी वक़्फ़ का दावा

  • वक़्फ़ बोर्ड द्वारा किए जाने वाले दावों पर विवाद के कई और उदाहरण हैं. जैसे गुजरात के सूरत में वक़्फ़ बोर्ड ने नगर निगम की इमारत पर दावा किया. दलील दी कि ऐतिहासिक दौर पर मुग़ल दौर में ये तीर्थयात्रियों की एक सराय थी. ब्रिटिश दौर में इस संपत्ति अंग्रेज़ सरकार ने अपने हाथ में ले लिया और आज़ादी के बाद भारत सरकार के पास चली गई. गुजरात वक़्फ़ बोर्ड का दावा है कि इस इमारत का मालिकाना हक़ औपचारिक तौर पर अपडेट नहीं हुआ इसलिए वो अब भी वक़्फ़ की है.
  • गुजरात के द्वारका में भी वक़्फ़ बोर्ड बेट द्वारका के दो द्वीपों पर अपने मालिकाना हक़ का दावा करता रहा है, जिस पर गुजरात हाई कोर्ट गंभीर सवाल खड़े कर चुका है.
  • वक़्फ़ बोर्ड ने केरल के एर्नाकुलम ज़िले के मुनाम्बम में भी 400 एकड़ ज़मीन पर अपना दावा किया. ये ज़मीन कई पीढ़ियों से वहां के ईसाई निवासियों के हाथ में रही है. वक़्फ़ बोर्ड के दावों का स्थानीय निवासियों ने जमकर विरोध किया.
  • बेंगलुरु में ईदगाह मैदान पर भी वक़्फ़ बोर्ड का दावा रहा है. सरकारी रिकॉर्ड में ईदगाह मैदान की जम़ीन किसी मुस्लिम संस्था को ट्रांसफ़र किए जाने का रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन वक़्फ़ फिर भी इस पर अपना दावा जताता रहा है.

साफ़ है कि वक़्फ़ की कई संपत्तियों पर भारी विवाद है. वक़्फ़ की रजिस्टर्ड अचल संपत्तियों में से 7% पर अतिक्रमण है. 2% पर क़ानूनी लड़ाई चल रही है और 50% की क्या स्थिति है ये पता नहीं है.

विधेयक लाने के पीछे क्‍या है मकसद?

संशोधन बिल के पीछे सरकार का मक़सद वक़्फ़ की संपत्तियों से जुड़े विवादों को कम करना है, लिटिगेशन को कम करना है. इस सबके लिए बिल में कई बदलावों का प्रस्ताव किया गया है. अभी तक वक़्फ़ ट्राइब्यूनल यानी वक़्फ़ न्यायाधिकरण संपत्तियों के विवाद का हल करता है.

यानी वक़्फ़ ट्राइब्यूनल अर्द्ध न्यायिक संस्थाएं हैं जिन्हें वक़्फ़ संपत्तियों के विवादों को सुलझाने के लिए बनाया गया है और मौजूदा वक़्फ़ क़ानून के तहत उनके फ़ैसलों को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती. सरकार के मुताबिक बिल में संशोधन की ये भी एक बड़ी वजह है.

वक़्फ़ संशोधन बिल का विरोध करने वालों का एक तर्क ये भी है कि इस बिल के बाद सरकार को वक़्फ़ की संपत्तियों के प्रबंधन में दखल देने का अधिकार मिल जाएगा और ये तय करने का अधिकार भी कि क्या कोई संपत्ति वक़्फ़ की है या नहीं.

दरअसल वक़्फ़ क़ानून का सेक्शन 40 वक़्फ़ बोर्ड को ये अधिकार देता है कि वो ये फ़ैसला करे कि कोई संपत्ति वक़्फ़ की है या नहीं. इस मामले में बोर्ड का फ़ैसला अंतिम होता है जब तक कि उसे वक़्फ़ ट्राइब्यूनल द्वारा बदला ना जाए या रद्द न कर दिया जाए.

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सेक्शन 40 को रद्द करना बड़ा बदलाव

वक़्फ़ संशोधन बिल के तहत सबसे बड़ा बदलाव वक़्फ़ क़ानून के सेक्शन 40 को रद्द करना है. संशोधन बिल से वक़्फ़ ट्राइब्यूनल की शक्ति डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर के हाथ में पहुंच जाएगी.

बिल कहता है कि कोई भी सरकारी संपत्ति जिसे बिल से पहले या बाद में वक़्फ़ की संपत्ति घोषित किया गया वो वक़्फ़ की संपत्ति नहीं मानी जाएगी. हालांकि इसका फ़ैसला वक़्फ़ ट्राइब्यूनल नहीं कलेक्टर के हाथों में होगा.

संशोधित बिल कहता है कि जब तक सरकार कोई फ़ैसला नहीं लेती तब तक विवादित संपत्ति को सरकारी संपत्ति माना जाएगा, वक़्फ़ संपत्ति नहीं. इस अहम बदलाव के पीछे सरकार की मंशा ये बताई जा रही है कि वक़्फ़ क़ानूनों का कथित दुरुपयोग होता है. सरकारी अधिकारियों के मुताबिक निजी संपत्तियों को वक़्फ़ की संपत्तियां घोषित करने के लिए वक़्फ़ ऐक्ट के सेक्शन 40 का काफ़ी दुरुपयोग होता है जिससे क़ानूनी लड़ाइयां होती हैं और विवाद होते हैं.

अब वक़्फ़ ट्राइब्यूनल का फ़ैसला अंतिम नहीं

वक़्फ़ संशोधन बिल के तहत वक़्फ़ ट्राइब्यूनल का फ़ैसला अब अंतिम नहीं होगा और ट्राइब्यूनल के फ़ैसले को 90 दिन के अंदर हाइकोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी.

संशोधन के तहत उस विचार को भी हटाया जाएगा जिसके तहत ‘इस्तेमाल से कोई संपत्ति वक़्फ़ की मानी जा सकती है अगर उसका मूल स्वामित्व संदिग्ध हो.

इस्लामिक क़ानून के तहत जब तक लिखित दस्तावेज़ीकरण नहीं हुआ तब तक किसी संपत्ति को ज़्यादातर मौखिक तौर पर वक़्फ़ का घोषित किया जाता था. उदाहरण के लिए वक़्फ़नामे की ग़ैर मौजूदगी में किसी मस्जिद को वक़्फ़ की संपत्ति माना जा सकता है अगर उसे लगातार इस तरह इस्तेमाल किया जाता रहे. कई मस्जिद और कब्रिस्तान इस वर्ग के तहत आते हैं.

संशोधित क़ानून में इस्तेमाल से वक़्फ़ के प्रस्ताव को हटाने का प्रावधान है. इससे वैध वक़्फ़नामा न होने पर वक़्फ़ की वो संपत्ति संदिग्ध हो जाएगी.

संशोधन विधेयक में कलेक्टर को सर्वे का अधिकार

संशोधन में वक़्फ़ संपत्ति के सर्वे का अधिकार भी बदल दिया गया है. सर्वे कमिश्नर की जगह कलेक्टर को सर्वे का अधिकार दिया गया है. सरकार की दलील है कि वक़्फ़ बोर्ड की संपत्तियों के सर्वे का काम काफ़ी ख़राब रहा है. गुजरात और उत्तराखंड में तो सर्वे शुरू तक नहीं हुए हैं, जबकि उत्तरप्रदेश में 2014 में दिए गए सर्वे के आदेश पर अभी तक काम नहीं हुआ है.

1995 का वक़्फ़ क़ानून कहता है कि औक़ाफ़ (वक़्फ़ का बहुवचन) का सर्वे राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक सर्वे कमिश्नर द्वारा किया जाएगा. संशोधित बिल सर्वे कमिश्नर की जगह डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को रखता है या फिर किसी अन्य अधिकारी को जिसे कलेक्टर नामित करे और जो डिप्टी कलेक्टर से नीचे की रैंक का न हो.

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गैर मुस्लिम भी हो सकेंगे वक्‍फ के सदस्‍य

वक़्फ़ बोर्ड संशोधन बिल की एक और आलोचना ये है कि इसके ज़रिए सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल और राज्य वक़्फ़ बोर्ड में प्रतिनिधित्व को बदला जा रहा है और अब ग़ैर मुस्लिम भी वक़्फ़ काउंसिल और बोर्ड के सदस्य होंगे.

वक़्फ़ ऐक्ट 1995 के तहत बोर्ड कुल 8 से 12 सदस्य होने चाहिए, लेकिन वक़्फ़ संशोधन क़ानून के तहत अधिक से अधिक 11 सदस्य होने चाहिए. अगर नियुक्ति की प्रकृति की बात करें तो वक़्फ़ ऐक्ट 1995 के मुताबिक सदस्य चुने और नामित दोनों ही थे और सबका मुस्लिम होना अनिवार्य था, लेकिन संशोधन बिल के तहत सभी सदस्य सरकार द्वारा नॉमिनेटेड होंगे.

बोर्ड के गठन की बात करें तो वक़्फ़ ऐक्ट 1995 के मुताबिक निम्न से एक से दो सदस्य होने चाहिए जैसे मुस्लिम सांसदों, मुस्लिम विधायकों या विधान पार्षदों, बार काउंसिल के मुस्लिम सदस्यों और मुतवल्ली. हालांकि संशोधन बिल में इसमें बदलाव किया गया है. सभी सदस्य नामित होंगे और ग़ैर मुस्लिम हो सकते हैं. एक अध्यक्ष, एक सांसद, एक विधायक, दो पेशेवर व्यक्ति, राज्य सरकार का एक अफ़सर, बार काउंसिल का एक सदस्य.

पुराने क़ानून के मुताबिक बोर्ड में नामित सदस्यों में एक मुस्लिम पेशेवर व्यक्ति, दो शिया और सुन्नी इस्लामिक विद्वान और एक राज्य सरकार का मुस्लिम अधिकारी होना चाहिए था, लेकिन नए संशोधन में जिन मुस्लिमों का होना अनिवार्य है उनमें एक मुतवल्ली, एक इस्लामिक विद्वान और पंचायत या नगर पालिका के दो सदस्य शामिल हैं.

पुराने क़ानून के मुताबिक राज्य सरकारों को स्टेट वक़्फ़ बोर्ड में एक सीईओ की नियुक्ति करनी होती थी. सीईओ एक मुस्लिम अधिकारी होना चाहिए था जो राज्य में डिप्टी सेक्रेटरी के स्तर का हो. अगर उस रैंक का मुस्लिम अधिकारी न हो तो उसके बराबर की रैंक के किसी मुस्लिम अधिकारी को नियुक्त किया जा सकता था. सीईओ को वक़्फ़ के मक़सद और मुस्लिम क़ानून के हिसाब से काम करना होता था. संशोधन बिल में सीईओ के मुस्लिम होने की अनिवार्यता ख़त्म कर दी गई है.

बिल में वक़्फ़ ट्राइब्यूनल के गठन में बदलाव की भी बात है. इसके तहत एक डिस्ट्रिक्ट जज और संयुक्त सचिव के स्तर का अधिकारी वक़्फ़ ट्राइब्यूनल में होगा. इसके अलावा ट्राइब्यूनल के फ़ैसले को हाइकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

बिल के तहत ये भी अनिवार्य किया गया है कि वक़्फ़ की हर संपत्ति को क़ानून के लागू होने के छह महीने के अंदर एक केंद्रीय पोर्टल पर रजिस्टर कराना होगा. हालांकि कुछ चुने हुए मामलों में वक़्फ़ ट्राइब्यूनल इस समय सीमा को आगे बढ़ा सकता है.

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