ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी में भारत पर 26 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात कही गई है. हालांकि फार्मा, सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्र में भारत को राहत मिली है.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए विभिन्न देशों पर लगाए जाने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ की घोषणा कर दी है. उन्होंने सभी देशों से आयात पर 10 फीसदी बेसलाइन के साथ टैरिफ की घोषणा की है. हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत से आयातित कुछ चुनिंदा उत्पादों पर टैरिफ नीति में छूट देने का फैसला किया है, जिसमें फार्मास्यूटिकल्स, सेमीकंडक्टर, तांबा और ऊर्जा उत्पाद शामिल हैं. इस फैसले को भारत के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, खासकर फार्मा सेक्टर के लिए, जो अमेरिकी बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति के लिए जाना जाता है.
जानकारों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए गए 26% रेसिप्रोकल टैरिफ ने भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौतियां और अवसर दोनों पैदा किए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति का शॉर्ट टर्म में भारत पर असर पड़ेगा, लेकिन लॉन्ग टर्म में इसके प्रभाव सीमित रह सकते हैं.
फार्मा सेक्टर को राहत, अमेरिका की मजबूरी
अमेरिका ने भारत से आयातित दवाओं पर टैरिफ नहीं लगाने का फैसला इसलिए लिया है, क्योंकि वह खुद इन दवाओं का बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं करता. भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में पहला स्थान रखता है. ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिकी नागरिकों को सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराने की दिशा में एक रणनीतिक निर्णय माना जा रहा है. इस फैसले से भारतीय फार्मा कंपनियों को अमेरिकी बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिलेगा.
अमेरिका में दवाओं की कीमतें पहले से ही एक संवेदनशील मुद्दा रही हैं. भारत से सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करके ट्रंप प्रशासन ने अपनी घरेलू स्वास्थ्य नीति को प्राथमिकता दी है.
भारतीय निर्यातकों के सामने हैं कई चुनोतियां
हालांकि फार्मा सेक्टर को राहत मिली है, लेकिन अमेरिका द्वारा लगाया गया 26% रेसिप्रोकल टैरिफ भारतीय निर्यातकों के लिए एक दोहरी तलवार साबित हो रहा है. यह टैरिफ उन सेक्टर्स पर लागू है, जो छूट की सूची में शामिल नहीं हैं. इससे भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने में मुश्किलें आ सकती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति में भारतीय निर्यातकों को अपने बाजार का डायवर्सिफिकेशन करना होगा.
लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है. उदाहरण के लिए, अफ्रीकी देशों में सस्ती दवाओं और ऊर्जा उत्पादों की भारी मांग है, जिसे भारत पूरा कर सकता है. इसी तरह, पश्चिम एशिया में तांबे और सेमीकंडक्टर जैसे उत्पादों के लिए नए अवसर तलाशे जा सकते हैं.
अमेरिकी टैरिफ के बाद भारत सरकार पर भी दबाव बढ़ गया है. प्रभावित होने वाले निर्यातकों को नए बाजारों में पैर जमाने के लिए सरकारी सहायता की जरूरत होगी. विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को “हैंड होल्डिंग” नीति अपनानी चाहिए, जिसमें निर्यातकों को मार्केट एक्सेस, वित्तीय सहायता और तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं. इसके अलावा, जिन सेक्टर्स पर टैरिफ का असर पड़ रहा है, उनके लिए “टैरिफ सब्सिडी पॉलिसी” तैयार करने की मांग भी उठ रही है.
शॉर्ट टर्म असर, लॉन्ग टर्म में उम्मीद
अमेरिका के इस टैरिफ फैसले का भारत पर तात्कालिक असर तो पड़ेगा, लेकिन लंबे समय में इसके प्रभाव को कम करने की संभावना है. फार्मा सेक्टर पर टैरिफ न लगने से भारत की अर्थव्यवस्था को एक मजबूत आधार मिलेगा. इसके अलावा, अगर भारतीय निर्यातक नए बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने में सफल होते हैं, तो अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम हो सकती है.
अमेरिका का भारत के फार्मास्यूटिकल्स, सेमीकंडक्टर, तांबा और ऊर्जा उत्पादों पर टैरिफ न लगाने का फैसला दोनों देशों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. जहां अमेरिकी नागरिकों को सस्ती दवाएं मिलती रहेंगी, वहीं भारत को अपने फार्मा सेक्टर की ताकत का लाभ उठाने का मौका मिलेगा. हालांकि, रेसिप्रोकल टैरिफ के कारण अन्य सेक्टर्स पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए सरकार और निर्यातकों को मिलकर काम करना होगा.
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